Madhushala

Author: Harivansh Rai Bachchan

Genre: Poetry

  • मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
    ‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,
    अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ –
    ‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।’। ६।

    चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
    ‘दूर अभी है’, पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
    हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
    किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।

    मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
    अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
    बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
    रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।

    धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
    मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
    पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
    कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।

    बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,

    रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला’

    ‘और लिये जा, और पीये जा’, इसी मंत्र का जाप करे’
    मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।

    एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
    एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
    दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
    दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।२६।

    अधरों पर हो कोई भी रस जिहवा पर लगती हाला,
    भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला,
    हर सूरत साकी की सूरत में परिवर्तित हो जाती,
    आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला।।३२।

    किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला
    किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,
    किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी
    किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९।

    दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,
    ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,
    कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?
    शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।।४६।

    मुझे ठहरने का, हे मित्रों, कष्ट नहीं कुछ भी होता,
    मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद, मिल जाती है मधुशाला।।४७।

    सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला,
    सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला,
    शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से
    चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।४८।

    बजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
    गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,
    शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को
    अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला!।४९।

    मुसलमान औ’ हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
    एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
    दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
    बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।

    कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,
    बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,
    एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,
    देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला!।५१।

    और रसों में स्वाद तभी तक, दूर जभी तक है हाला,

    कभी न सुन पड़ता, ‘इसने, हा, छू दी मेरी हाला’,

    कभी न कोई कहता, ‘उसने जूठा कर डाला प्याला’,
    सभी जाति के लोग यहाँ पर साथ बैठकर पीते हैं,
    सौ सुधारकों का करती है काम अकेले मधुशाला।।५७।

    रंक राव में भेद हुआ है कभी नहीं मदिरालय में,
    साम्यवाद की प्रथम प्रचारक है यह मेरी मधुशाला।।५९।

    लिखी भाग्य में जितनी बस उतनी ही पाएगा हाला,
    लिखा भाग्य में जैसा बस वैसा ही पाएगा प्याला,
    लाख पटक तू हाथ पाँव, पर इससे कब कुछ होने का,
    लिखी भाग्य में जो तेरे बस वही मिलेगी मधुशाला।।७०।

    मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना
    राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।।८२

    नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला
    काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,
    जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की
    धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।।८५।

    कितनी जल्दी रंग बदलती है अपना चंचल हाला,
    कितनी जल्दी घिसने लगता हाथों में आकर प्याला,
    कितनी जल्दी साकी का आकर्षण घटने लगता है,
    प्रात नहीं थी वैसी, जैसी रात लगी थी मधुशाला।।११२।

    पीनेवाले, साकी की मीठी बातों में मत आना,
    मेरे भी गुण यों ही गाती एक दिवस थी मधुशाला।।११३।

    इस उधेड़-बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया –
    मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!।११९।

    वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला,
    जिसमें मैं बिंिबत-प्रतिबंिबत प्रतिपल, वह मेरा प्याला,
    मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है,
    भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला।।१२१।

    साकी से मिल, साकी में मिल अपनापन मैं भूल गया,
    मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला।।१२२।

    पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
    फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।।१२४।

    अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
    अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
    फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उज्ञल्तऌार पाया –
    अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!।१२५।

    Goodreads Link: मधुशाला: Madhushala by Harivansh Rai Bachchan (goodreads.com)